
राजस्थान की धरती पर जब भी वीरों की बात होती है, मेवाड़ का नाम अपने आप सामने आ जाता है।
और मेवाड़ की शुरुआत जिस योद्धा से जुड़ी मानी जाती है, उसका नाम है — भप्पा रावल।
उनके बारे में इतिहास में जितना लिखा गया है, उससे कहीं ज्यादा कहानियाँ लोगों की जुबान पर जिंदा हैं। गाँवों में, लोकगीतों में, राजपूत कथाओं में — हर जगह भप्पा रावल को ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता है जिसने कठिन समय में मेवाड़ को संभाला और विदेशी आक्रमणों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
हालाँकि उनकी जिंदगी से जुड़ी हर बात का पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन इतना जरूर माना जाता है कि वे मेवाड़ के शुरुआती सबसे ताकतवर शासकों में से एक थे।
कहा जाता है कि भप्पा रावल का असली नाम कालभोज था।
उनका बचपन आसान नहीं था।
पिता की मृत्यु जल्दी हो गई थी और राजनीतिक दुश्मनों का खतरा हमेशा बना रहता था। इसलिए उनकी माँ उन्हें लेकर सुरक्षित जगहों पर चली गईं।
राजमहल की सुविधाओं से दूर, उन्होंने साधारण लोगों के बीच जीवन बिताया।
लोककथाएँ बताती हैं कि बचपन में:
यहीं से उनके अंदर एक योद्धा तैयार होना शुरू हुआ।
भप्पा रावल की कहानी में एक दिलचस्प मोड़ तब आता है जब उनकी मुलाकात हरित ऋषि से होती है।
कहते हैं कि ऋषि ने पहली ही नजर में समझ लिया था कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।
उन्होंने कालभोज को सिर्फ युद्ध नहीं सिखाया, बल्कि यह भी सिखाया कि राज्य कैसे चलाया जाता है, लोगों का भरोसा कैसे जीता जाता है और कठिन समय में फैसले कैसे लिए जाते हैं।
राजस्थान की कई लोककथाओं में यह हिस्सा आज भी सुनाया जाता है।
धीरे-धीरे कालभोज युवावस्था में पहुँचे और आसपास के योद्धाओं को अपने साथ जोड़ना शुरू किया।
उस समय चित्तौड़ और मेवाड़ राजनीतिक रूप से कमजोर माने जाते थे। अलग-अलग ताकतें वहाँ प्रभाव जमाने की कोशिश कर रही थीं।
भप्पा रावल ने यही मौका देखा।
उन्होंने छोटी-छोटी टुकड़ियों को संगठित किया, अपनी सेना बनाई और आखिरकार चित्तौड़गढ़ पर अधिकार स्थापित किया।
यहीं से मेवाड़ के एक नए दौर की शुरुआत मानी जाती है।
8वीं शताब्दी का समय भारत के लिए आसान नहीं था।
अरब सेनाएँ तेजी से आगे बढ़ रही थीं।
वे फारस तक कब्जा कर चुकी थीं और सिंध तक पहुँच गई थीं। पश्चिम भारत में डर था कि कहीं ये सेनाएँ राजस्थान और गुजरात तक न आ जाएँ।
इसी दौर में कई भारतीय राजाओं ने मिलकर विरोध शुरू किया।
इतिहासकार मानते हैं कि भप्पा रावल भी उन शासकों में शामिल थे जिन्होंने अरब आक्रमणों के खिलाफ मोर्चा संभाला।
राजस्थान की लोककथाओं में भप्पा रावल की सबसे चर्चित कहानियाँ उनके पश्चिम की ओर अभियानों से जुड़ी हैं।
कई कथाओं में कहा जाता है कि:
कुछ कहानियाँ तो यहाँ तक दावा करती हैं कि उनका प्रभाव ईरान तक महसूस किया गया।
लेकिन यहाँ इतिहास और लोककथा एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
इतिहासकारों के मुताबिक:
फिर भी राजपूत परंपराओं में भप्पा रावल को पश्चिमी सीमाओं का रक्षक माना जाता है।
Hari Singh Nalwa का नाम अफगान सीमा तक भारतीय शक्ति पहुँचाने वाले सबसे प्रसिद्ध योद्धाओं में लिया जाता है।
लेकिन उनसे बहुत पहले भी:
फर्क सिर्फ इतना है कि हरि सिंह नलवा के समय के ऐतिहासिक रिकॉर्ड ज्यादा स्पष्ट हैं, जबकि भप्पा रावल की कई बातें लोककथाओं और पारंपरिक कथाओं में जीवित हैं।
भप्पा रावल भगवान शिव के भक्त माने जाते हैं।
राजस्थान में Eklingji Temple का नाम मेवाड़ की परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है।
कहा जाता है कि मेवाड़ के राजा खुद को राज्य का असली शासक नहीं, बल्कि भगवान एकलिंग जी का सेवक मानते थे।
यह परंपरा आगे कई पीढ़ियों तक चलती रही।
लोककथाओं के अनुसार जीवन के अंतिम समय में भप्पा रावल ने राजपाट छोड़ दिया था।
कुछ कथाएँ कहती हैं कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन अपना लिया और संन्यास ले लिया।
लेकिन उनके जाने के बाद भी मेवाड़ की शक्ति बढ़ती रही।
आगे चलकर इसी परंपरा से:
क्योंकि वे सिर्फ एक राजा नहीं थे।
वे उस दौर का प्रतीक बन गए जब भारत की पश्चिमी सीमाओं पर संघर्ष चल रहा था।
जब छोटे-छोटे राज्य अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे।
और जब वीरता केवल युद्ध जीतने से नहीं, बल्कि लोगों के मन में उम्मीद जगाने से साबित होती थी।
इसीलिए आज भी राजस्थान में भप्पा रावल का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।